नीतू मुकुल

कुछ दिन तो और ठहर जाते...!

        
महज शब्दों का....! एक नेअल्लाह सीखा दूसरे ने राम| इन्ही शब्दों की मान्यताओं को गहरे रूप में समझने, समझाने वाले और सँजोने वाले साहित्यकार बहुत कम हुए हैं | पहले वो शब्दों को ठोकते हैं, बजाते हैं फिर कलम से उन्हें रूप देते, जो मोहताज नहीं रहता अपने परिचय का | इनका लिखा किसी रूप विधान में नहीं भरमाता, न हीशैल्पिक कलाबाजियों में और न जबरन चमत्कारों में भटकाते हैं| ....

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