वन्दना यादव

मेरे प्रेम भाई


प्रेम भारद्वाज जी के बारे में बात करनी है तो बात पाखी से शुरू होगी। प्रत्येक रचनाकार के लिए पाखी में छपना सम्मान का विषय रहा है और इसके साथ जो अगला वक्तव्य रहा करता था वह था - पाखी के संपादक, प्रेम भारद्वाज के संपादकीय बेहद पठनीय होते हैं। कहा तो यह भी जाता था कि राजेन्द्र यादव जी के बाद सिर्फ प्रेम भारद्वाज के पास कलम का पैनापन है। 

प्रेम भारद्वाज से पहली....

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