दिव्या विजय

प्रेम गरल 

दो घुड़सवार घोड़े दौड़ाते चले आ रहे थे। वे एक-दूसरे को देखतेए घोड़े को एड़ लगाते और घोड़े हवा से बातें करने लगते। उनकी गति देख सब हतप्रभ थे। देखने वालों की आँखों में अचरज के साथ ईर्ष्या भी थी। वे मीलों का सफ़र पैदल तय करते हैं और ये पलक झपकते ही यहाँ से वहाँ जा पहुँचते हैं। घोड़े रखना हँसी-खेल तो है नहीं। वे राजमहल के व्यक्ति प्रतीत होते हैं। उनके वस्त्र और आँखेंए दोनों राजसी ....

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