रूपा सिंह

तीन बजकर चालीस मिनट

मार्च और अक्टूबर अमूमन ऐसे महीने हैं जिनके आने की खबर फिजायें खुद ब खुद दिया करती हैं। एक नशा-सा तारी रहता है फ़िजाओं में। मदमाती एक खुश्बू। पोर-पोर खोल देने वाली। रग-रग को मीठी ऐंठन से मरोड़ देने वाली। दिल के दरवाजों के बाहर बारहा शहनाई बजती हो मानो। यह मार्च महीना था। सर्दी जाने-जाने को थी। गुनगुनी धूप मानो सोया प्यार जगाती थी। यूनिवर्सिटी की यह इमारत गहरे गुलाबी बोगनव....

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