प्रेम रंजन अनिमेष

एक स्वप्निल प्रेमकथा

कमरे की खिड़की खोली। अब उतना पास नहीं था। पर इतना फासला भी नहीं कि नजर से दूर। और इस दूरी से देखने की हसरत और बढ़ गयी थी। यहाँ से उसके घर की छत दिखाई देती और बरामदा। कभी नजर आती वह भी। सुबह शाम अकसर छत पर नहीं तो ऊपरी तल के ओसारे  में। किस्मत अच्छी हो तो कभी कभार दिन में एकाधिक बार। हाथ में कुछ पढ़ने के लिए रख लेता और वहीं अपने कमरे की खिड़की के पास बैठा रहता। देखते हुए कि कोई देखे ....

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