अशोक कुमार पांडेय

दिया बुझा दिया है अभी मसल कर आहिस्ता

दिया बुझा दिया है अभी मसल कर आहिस्ता

डूबते धुएं में देखता हूं तुम्हारा पिघलता अक्स 

 

(एक)

 

कैसी हो तुम ठीक इस वक्त 

जब आवाजें बिखरने लगी हैं धुंध में 

शाम ने अंगड़ाई ली है और 

हलके नशे में रात सी हो रही है उसकी शक्ल 

 

एकदम तुम जै....

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