अरुण शीतांश

हम एक जैसे ही हैं

सामने वज्रपात करती हुई 

वह आई और समा गई नदी में

 

मुहाने पर व्याल के फन की तरह गर्दन

और बादलों के फाहे की तरह  

कुंतल नजर आ रहे थे

 

ऊपर से पानी बह रहा था

मुलाकात हर मोड़ पर होती रही

दरख्तों की छायाओं में

धीरे से आई एक दिन

औ....

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