श्रुति कुशवाहा

पंचतत्व

मैंने तुम्हें देखा

आकाश सी विस्तृत हो गयी कल्पनाएं

पृथ्वी सा उर्वर हो गया मन

सारा जल उतर आया आंखों में

अग्नि दहक उठी कामना की

विचारों को मिल गये वायु के पंख

 

देखो न

कितना अच्छा है देखना तुमको---

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