पुरु मालव

कौतूहल

कौतूहल चुकता जा रहा है
जीवन से 
 
सड़क किनारे अब
मजमा नहीं लगता
लोग आते हैं
जाते हैं
रुकते नहीं
बस डुगडुगी बजती रहती है
 
सड़क अचानक चीऽकर
खामोश हो जाती है
मगर रुकती नहीं
रफ्तार पहियों की 
 
घर की बातें 
फुसफुसाकर
घर ही में दफ़न हो जाती हैं
चिल्लाती हुई
चौराहे पर नहीं आती
 
छोटी-छोटी  बातें भी
बहुत बड़ी होत....

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