सुधीश पचौरी

अस्मितामूलक विमर्शों की शक्ति व सीमा


जैसा कि हम बता चुके हैं कि अस्मितामूलक विमर्श सबसे पहले अपने से ‘अन्य’(भिन्न या अलग) को ‘एक्सक्लूड’ (अलहदा) करने में यकीन करते है-वे अपने हर ‘अन्य’ को वे अपने दुश्मन की तरह देखते हैं-इसी मानी में उनका मिजाज ‘टोटलिटेरियन’ (निरंकुशतावादी) होते हैं- वे जन्म तो ‘उत्तरआधुनिक दशाओं’ में लेते हैं लेकिन अंततः ‘आधुनिकतावादी’ की तरह ‘निरकुशतावादी’  हो उ....

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