सूरज पालीवाल

दुनिया ठेके पर नहीं बदली जाती 

स्वयं प्रकाश उस दौर के कहानीकार हैं, जिस दौर में अमानवीय होते समाज को मानवीय बनाये रखने के लिये आंदोलन और सामाजिक सरोकार अपने भरे-पूरे रूप में उपस्थित थे । समाज बदल रहा था, उसमें विकृतियां आ रही थीं लेकिन उस बदलाव को सही मार्ग पर ले चलने तथा विकृतियों को समाप्त करने के लिये संगठन सक्रिय थे । मनुष्य एकदम अकेला नहीं था, वह अपने परिवार, समाज तथा संगठन में शक्ति पाता था । उसकी च....

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