भरत प्रसाद

औघड़ साधक नहीं, दर्शक चित्रकार 

सत्तर के दशक में नयी कहानी आन्दोलन की सफलता ने हिन्दी कहानी को अभिव्यक्ति की एक नयी दिशा में मोड़ दिया। आजादी के पूर्व प्रेमचंद और उसके बाद रेणु दो ऐसे मानक हैं, जिनसे होकर हिन्दी कहानी का जनपथ गुजरता है,सृजन के स्वर्ण पथ की तरह।प्रेमचंद की परम्परा में आगे चलकर अनेक कथाकार प्रकट हुए किन्तु रेणु की परम्परा एक खास काल में लोकप्रिय होकर रह गयी और आंचलिकता आगामी कथाकारों के ....

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