डाॅ. संदीप अवस्थी

यथार्थ के धरातल से टकराता विनय

दरअसल हम यह भूल करते हैं कि हर वस्तु, संवाद, व्यक्ति, रिश्ते, परिस्थितियों को स्थायी मानकर उसके अनुसार अपने कार्यों को, विचारधारा को लेकर बढ़ते हैं। जबकि वह सब बहुत से कारणों, अलग-अलग जगह कार्य कर रहे बाह्य और आंतरिक कारणों के दबाव और अपने समय से सापेक्ष और संचालित होती है। इसमें व्यक्ति और खासकर यदि आप कार्ड होल्डर पार्टी के हैं तो उसकी अपनी विचारधारा होती है जिसे फॉलो करन....

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