अवनीश यादव

जंगल की आग नहीं, जंगल का दाह

'शोर यूंही न परिंदों ने मचाया होगा

कोई जंगल की तरफ शहर से आया होगा|'

तरक्कीपसंद महबूब शायर कैफ़ी आज़मी जी की ग़ज़ल 'शोर यूंही न परिंदों ने मचाया होगा' का यह चर्चित शेर, समकालीन कथाकार स्वयं प्रकाश की कहानी 'जंगल का दाह' से गुज़रते वक्त बरबस याद आ जाता है |मानो दोनों एक दूसरे के लिए रचे गये हों| परिस्थितियां हूबहू हैं |जंगल की तर....

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