-अनुवाद: पापोरी गोस्वामी

रम्यभूमि

लकड़ी की दूकान से लाखेस्वर के चले आने के बाद महानंद ने एक और सिगरेट सुलगा लिया. थोड़ी देर तक ऐसे ही खड़े रहने के बाद वो दूकान से निकल आया. चौकीदार वहाँ से खिसक गया था. लकड़ी की गठरियों में से राम भी निकल आया था. उसे वहाँ देखकर महानंद जैसे चौक उठा.
“ तू यहाँ क्या कर रहा है ?”
राम ने एकबार पिता का चेहरा देखा और दूसरी तरफ मुँह फेर लिया. उसका चेहरा गंभीर था. महानंद ये सोचकर थोडा चि....

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