नीलोत्पल रमेश

प्रेम

कोई छुईमुई का फूल नहीं है
और न ही
दिखाई पड़ने वाली
कोई चीज
कि छूते ही
खत्म हो जाएगा

प्रेम
ढाई अक्षर का तो है
लेकिन इसमें
ब्रह्मांड का कण-कण
समाहित है

प्रेम
इसका गान करते-करते
असंख्य कवि - कथाकार
काल के गाल में
समाहित होते चले गए
पर इसकी विराटता
अवर्णनीय है

प्रेम
कुछ अंदर....

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