किरण सूद

गाँधी तेरे देश में

क्या  सरकार की आत्मा होती है? सुचेता काग़ज़ पर आड़ी-तिरछी रेखाओं में उलझ रही है....
सरकार कोई मनुष्य नहीं है तो आत्मा कैसी ...?
हम्म्! मनुष्य नहीं तो बेजान है क्या...?
मात्र पद्धति या पद्धार्थ .... तो भी विस्तार व विकास की संभावना अनन्त है ....
‘सुनिए जी !’ पीछे से अगोचर आवाज़ आई। सुचेता ने सिर घुमकर पूछना चाहा,’क्या?’
न जाने कैसे वह स्वयं ही जड़ क्यों है इस समय।
उ....

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