मंजुला बिष्ट

 उस रात...?

उसने कुत्तों के पहुँचने से पहले ही रोटी अपने अधिकार में कर ली।खिसियाये कुत्तों की धीमी गुर्राहट सेे बेपरवाह वह उस इकलौती रोटी पर टूट पड़ा।"हुँह!फ़िर सूखी रोटी, न जाने कब तक यूँ गुज़ारा करना पड़ेगा।"बड़बड़ाते हुए उसने अंतिम कौर निगल लिया।अगले ही पल उसे ख़ुद पर आश्चर्य हुआ कि वह कब से इस तरह की शिकायतें करने लगा है!उसकी बुझी निगाहें धूसर घुमड़ती बदलियों पर थम गई।उसे लगा,दुःख भी....

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