जावेद आलम खान

देश

महज ज़मीन का टुकड़ा नहीं है देश
दीवार पर कीलों से ठुकी कोई तस्वीर भी नहीं
जिसे देखकर की जाए सियासी तकरीर
देश नहीं होता कागज पर लिखी तहरीर
कि पढ़कर वतनपरस्ती के मुबाहिसे किए जाएं
कोई अफीम की गोली नहीं
कि खाएं और उन्माद में जिए जाएं

देश खेतों में जुटे किसान की पीड़ा में बसता है
देश दिल्ली की संसद में नहीं
धूल में लिपटे बच्चों की क....

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