संदीप तिवारी

पहले भी कम नहीं थीं मुश्किलें

ख़बरों में अभी भी पैदल चल रहे हैं लोग
साइकिल से जा रहे हैं
हज़ार-हज़ार किलोमीटर दूर अपने गाँव
दिन भर, रात भर,
भूख प्यास गर्मी में, लू में
चले जा रहे हैं
पहले भी कम नहीं थीं मुश्किलें
रेल के दरवाजे पे लटककर
शौचालय के बगल खड़े होकर
जाते थे लोग
ऊपर की सीटों में लपेटकर गमछा
बैठने की जगह बनाते थे
जहाँ सामान रखा जाना चाहिए
वहाँ खुद गठरी बन जाते थे
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