-अनुवाद: पापोरी गोस्वामी

-रम्यभूमि-


लेखक- डॉ भवेंद्र नाथ सैकिया
अनुवाद– पापोरी गोस्वामी

राम दौड़ता हुआ आँगन तक पहुँच गया था, ठीक उसी समय महानंद हड़बड़ाता हुआ बाहर का मुख्य दरवाज़ा खोलकर बाहर निकल आया. उनके पीछे पार्वती भी बाहर आ गयी. लकड़ी की दूकान, दरवाज़ा और दीवार, अन्दर का लगभग सारा सामान सूखकर जलाऊ लकड़ी जैसे बने गए थे. कमरे के दक्षिण कोने से आग लगनी शुरू हुई थी. कुछ ही समय में उस दिशा ....

Subscribe Now

पूछताछ करें