राजा सिंह

 “त्रिकोण”

  वसु को जब कभी इस शहर आना होता है तो अक्सर उस पुराने सपने में लौट जाना होता है जो कभी उसकी हकीकत थी.वसु का घर,बचपन से लेकर जवानी का घर.बनते बिगड़ते सपनों का घर.वही बंगला था,वही भाई था,जैसे कभी बरसों पहले था. बहुत कुछ बदला था परन्तु नहीं बदला था तो उससे जुड़ी वे यादें जो बरसों पीछे ढकेल ले जाती थी, अभी भी जीवंत रूप में आ खड़ी होती,जैसे बेबी की शांत स्निग्ध मुस्कान,गहरी डूबती बोलती ....

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