कृष्ण बिहारी

ऐसे-ऐसे लोग मिले



मजरूह सुलानपुरी का एक प्रसिद्ध शेर है-
‘मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंजिल मगर
लोग साथ आते गए कारवां बनता गया।’


जिंदगी की यात्रा अपने आप के साथ होती है। अकेले-अकेले होती है। खुद को ले चलना पड़ता है। कभी-कभी ढोते हुए भी। अपना कुली बनकर। कोई किसी के साथ नहीं चलता। कोई किसी को ले नहीं जाता। यह साथ चलना, ले जाना और रहना एक दिखावा है। मात्र एक प....

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