पुनर्पाठ

  • संस्मरण का अक्षांश और..... 

    स्वयं प्रकाश की पुस्तक हमसफरनामा, जब रचना प्रकाशन जयपुर से वर्ष-2000 में प्रकाशित हुई थी, तभी मैंने इसे पढ़ लिया था। पु

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  • औघड़ साधक नहीं, दर्शक चित्रकार 

    सत्तर के दशक में नयी कहानी आन्दोलन की सफलता ने हिन्दी कहानी को अभिव्यक्ति की एक नयी दिशा में मोड़ दिया। आजादी के पूर

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  • स्वयं प्रकाश की कहानी ‘नैनसी का धूड़ा’ के बहाने कुछ उधेड़बुन 

    साहित्य, समानधर्मा कलाओं के साथ, सभ्यता का दस्तावेज़ तो है ही, वह सभ्यता की अंतर्यात्रा भी है और उसका पुनर्परीक्षण भ

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  • प्रकृति और मनुष्य के रिश्ते का पुनर्पाठ

    स्वयं प्रकाश हिंदी साहित्य का वह लब्ध प्रतिष्ठित नाम है, जिसने कुछ अछूते, विरल विषयों पर समृद्ध लेखन किया है. हालाक

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  • बदलते वक्त का आईना

    निबन्ध लेखन , लेखन की एक विचार प्रधान विधा है । विचारो की प्रधानता , गहनता और निरन्तर विचारो का सारगर्भित प्रभाव निब

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  • त्रासदी के अनछुए प्रसंग ‘बलि’

    स्वयं प्रकाश ने जब कहानियाँ लिखना शुरू किया, तब ऐसा नहीं था कि फैंटेसी और अमूर्तन का कहानी में उपयोग करने से कहानीक

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  • नये पाठ में सार्थक कहानी ‘बलि’

    स्वयं प्रकाश की ‘बलि’ आदिवासी जीवन की पारंपरिक जड़ता तथा विकास के प्रपंच में फंसी स्त्री के जीवन की त्रासदी की अवि

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  • सुमि ने कहा, जा मर जा…

    स्वयं प्रकाश की कहानी ‘अगला जनम’ पर कुछ बातें कहना चाहती हूं। लेकिन, उसके पहले आपसे दो घटनाएं साझा करती हूं....

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  • यथार्थ के धरातल से टकराता विनय

    दरअसल हम यह भूल करते हैं कि हर वस्तु, संवाद, व्यक्ति, रिश्ते, परिस्थितियों को स्थायी मानकर उसके अनुसार अपने कार्यों

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  • आदिवासी जीवन का आईना: जंगल का दाह

    सन् नब्बे के बाद हिंदी कहानी की दिशा एक बार फिर बदलती है। इस दौर में भले नई कहानी आंदोलन (1950-60) जैसा शोर-शराबा नहीं होत

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  • समकालीन यथार्थ और स्वयं प्रकाश

    कहानी अपने समय के अंतर्विरोधों और सामाजिक परिवेश के द्वंद्वात्मक संबध से ही उत्पन्न होती है । जीवन के एक कालखंड और

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  • मार्फ़त ‘कहा-सुना’

    आधुनिक साहित्य में आने वाली विधाओं में इन दिनों बहुत कुछ लिखा-पढ़ा जा रहा है। लिखने और पढ़ने की यह प्रक्रिया साहित्य

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  • डाकिया डाक लाया

    अभी कुछ समय पहले हिंदी साहित्य के प्रख्यात कहानीकार स्वयं प्रकाश की आत्मकथात्मक  संस्मरण पुस्तक ‘धूप में नंगे पा

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  • जंगल की आग नहीं, जंगल का दाह

    तरक्कीपसंद महबूब शायर कैफ़ी आज़मी जी की ग़ज़ल 'शोर यूंही न परिंदों ने मचाया होगा' का यह चर्चित शेर, समकालीन कथाकार स

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  • स्वयं प्रकाश : कहानी में ज़िंदगी के अनुभवों की चित्रकारी

    स्वयं प्रकाश की लिखी कुछ कहानियों को पढ़ते हुए अक्सर यह महसूस किया जा सकता है कि उनकी कल्पित दुनिया के विरुद्ध जो छो

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  • विमर्श के आँगन से बाहर स्त्री के पक्ष में खड़ी स्वयं प्रकाश की कहानियाँ

    1990 के बाद हिंदी कहानी के आसमान में भूमंडलीकरण, उदारीकरण, निजीकरण के साथ-साथ मंडल कमंडल और विमर्शों के घने बादल गहरान

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  • आधुनिकीकरण का यथार्थ और ‘गौरी का गुस्सा‘

    ‘हिंदी साहित्य के प्रतिष्ठित साहित्यकार स्वयं प्रकाश हमारे बीच नहीं रहे।’ 07 दिसम्बर 2019 को यह शोक संदेश जब मैंने फे

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