कहानी

  • आदमी की राख

    बहुत-सी कहानियां ऐसी होती हैं जो आपको भीतर-ही-भीतर कहीं कुरेदती रहती हैं। कागज पर भी नहीं उतरतीं लेकिन एक कचोट मन पर

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  • पलायन

    वे जा रहे हैं। वह परिसर से बाहर खड़ा, उन्हें दूर जाते देख रहा है। जब वे नजरों से ओझल हो गए तो वह लौट आया है।

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  • कौन सो संकट मोर गरीब को...

    ‘सरजी, हमें पहचाने कि नहीं?’’ उसने बड़ी देर तक मुझे एकटक निहारने के बाद थोड़ा पास आकर पूछा, मानो मेरी चाय की आखिरी चु

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  • आठवां फेरा... नो हुक-अप प्लीज...!

    आदमी के आंखों का सूखता पानी और बहते आंसू की जिम्मेदारी भी बदलते दौर की कहानी हो चली है। रिश्ते खत्म होने की चली बयार

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  • सखी

    रात में सोते हुए जागने की बीमारी है मुझे बरसते पानी की ‘टप-टप’ ध्वनि के बावजूद जब अहाते के बाहरी दरवाजे की कुंडी खड़

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  • छोटे अघोरी का श्राप

    ‘‘मुझे नहीं कहनी चाहिए थी उससे वो बातें कि उनके कोई मतलब नहीं थे। मुझे करनी चाहिए थी उससे सही-सही बातें, उसके मन की ब

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  • जलेबी मेले की

    बंदला गांव प्रसिद्ध बंदलाधार के शिखर पर बसा बहुत सुंदर गांव है। बंदलाधार के पूर्व में बहादुरपुरधार और पश्चिम में

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