कहानी

  • पत्थर

    साली यह पुलिस की नौकरी! जाने जिंदगी की कितनी गंदगियां दिखलाएगी? ---अभी एक साल की नौकरी में ही इतने घटियापे देख लिए तो

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  • गोरखू चाचा का संकट

    गोरखू चाचा की बेटी निरमा सुबह ही बता गई थी कि आज ‘‘बाबा’’ फिर किसी बात पर गुस्सा हैं और सुबह से ही गाली-गलौज कर रहे है

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  • काला दरिया

    बहुत सोच-विचार के बाद आपको यह पत्र लिखने बैठा हूं। विगत कई वर्षों की पीड़ा जब वक्त की चट्टान तले दबकर धूमिल होने की

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  • डेन्यूब किनारे हिमालय का पक्षी

    फ्रैंकफर्ट में जहाज बदला और हंगरी के स्थानीय समय के अनुसार पूर्वाह्न साढ़े दस बजे, जिस वक्त भारत में दोपहर के दो बज

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  • और बस रेत

    ‘अब कहां तक क्या-क्या बताएं? जीवन कितनी बार पटखनी देता है, सोचती हूं तो कलेजा चिरने लगता। जिसका पति डेलिवरी की नाजुक

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  • समानांतर

    समीरा ऊब कर उठ बैठी। उसे प्यास लगी हुई थी जिसे भुला कर वह सोने का प्रयत्न बहुत देर से कर रही थी लेकिन अब कंठ में जलन ह

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  • मोहपाश

    काफी देर डाक बंगले के बरामदे में बैठे वो उस खूबसूरत दृश्य को निहार रहे थे। पूनम का चांद धीरे-धीरे ऊपर उठता जा रहा था

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  • बौड़ा डुंगर

    मानसी अपनी पढ़ाई पूरी कर चुकी थी। मध्यप्रदेश के एक छोटे से आदिवासी कस्बे के सरकारी महाविद्यालय से एम-ए- किया था उसन

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  • हिल स्टेशन

    उन दिनों मिर्जा के होशोहवास पर हिल-स्टेशन बुरी तरह सवार था। लेकिन हमारा हाल उनसे भी ज्यादा खस्ता था। इसलिए कि हम पर

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  • कविता पर अकवियों का वर्चस्व

    कविता मेरे लिए असाध्यवीणा है। मेरी कविता का ध्रुवक है कालांकित में कालाकिंत सत्य का अन्वेषण। बातचीत की लय में नई आ

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