कविता

  • शिव कुमार दुबे

    कौम जो गंदा करती खून अपना खून ते नाता तोड़ बार-बार जद्दोजहद में ताबड़तोड़ करती  एक ही पैमाना नापने का/जिसकी इबारते

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  • सुभाष शर्मा 

    तुमने तो यह रूप धरा था अपने साथ हुए तिरस्कार के प्रतिशोध के लिए  और पूर्ण पुरुष न होते हुए भी इतिहास में कर दिया था अ

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  • श्याम सुंदर चौधरी

    राक्षसी लिप्सा की शिकार, घर्षण का वीभत्स चेहरा हड़प लेता है उसका सम्मान

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  • जगदीश सौरभ

    गली के खंभों पर लटके जुगनू थकर कर ऊंघने लगते हैं, मेरे दुःख तब भी जागते हैं/चांद की पलकें भारी होकर/ सौ-सौ मन की नींद ल

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  • दुर्गेश तिवारी

    लबरेज जिंदगी से जहां उसका जिस्म नोंचने आते हैं  कुछ हैवान, वह अक्सर आसमान में  फैले सितारों को देखती है

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