कविता

  • संवार

    हांलाकि यह एक भरा-पूरा जनसमूह है किंतु यहां भी हर कोई अपने-अपने में अकेला हर किसी के हैं कई-कई फाड़

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  • जिंदगी

    गुलमोहर के फूलों में आ रहे लेकिन न दिख रहे परिवर्तन को देखने के लिए ढूंढनी होगी तीसरी आंख जो मिलती है अनुभव के कछार

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  • प्राथमिकता

    मैं कभी विशेष न रही किसी के लिए बस शेष ही स्वीकार्य हुई। हां शेष में हमेशा सराहा गया मुझको मेरे सिवा कभी कुछ न रह पा

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  • पीसा की झुकी मीनार पर

    कोई उसे धक्का मारकर टेढ़ा कर देने का श्रेय लेना चाहता था कोई जुड़ जाना चाहता था उछलकर सूरज और मीनार को जोड़ती काल्

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  • एक बार बीसेक साल हुए

    आशंकाओं और दुविधाओं को झटकते हुए मैंने कहा, बैठो भाई! 

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  • भोर--- होने को है

    एक उनींदी रात में  नन्हीं बेटी के ठंडे पैर  अपने हाथों में रखकर  ऊष्म करता हूं 

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  • नाविक

    नाविक चलते रहो जैसे चलती है नदी नाविक बहते रहो

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  • हो रहें है असभ्य

    धीरे-धीरे कहीं कुछ खो रहें हैं हम पता नहीं हंस या रो रहें हैं हम क्या आपको कुछ एहसास हो रहा है कहीं कुछ हौले-हौले खो र

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