जब 2008 में ‘पाखी’ की शुरुआत हुई थी और मैंने स्वयं उसका संपादन संभालता था, तब मेरे सामने एक प्रश्न बार-बार कठिन बनकर खड़ा हो जाता था-संपादकीय किस विषय पर लिखा जाए। मैं मूल रूप से एक राजनीतिक पत्रकार रहा हूं और जैसा कि मैंने कई बार कहा भी है, हिंदी साहित्य की दुनिया में मैं मानो पैराशूट से कूदा था। उस दौर में मेरे संपादकीय पर कई बार मुझे अपने साहित्यिक मित्रों Subscribe Now
