महाकाव्य है दुख का चेहरा
(फिलिस्तीन और इस्राइल युद्ध पर केंद्रित)
युद्ध के मलबे में बच गई
उसकी उठी पलकें, झुक गईं
धंस गईं अपने ही मौन में
फंस गईं मलबे में
हताशा की नदी जैसी।
चीखें दफ्रन हुईं कानों में?
कराहें जमींदोज हो गईं?
बंद हुए पलकों में मृत्यु के दृश्य?
घावों बेहिसाब की टीस
सांसों में समय समा गई?
सन्ना....
