शुभम मोंगा

संघर्ष और जनपक्षधरता का जीवट आख्यान: कांधों पर घर

‘शहर देश के भूगोल में फैली गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा, शोषण के अंधेरों में चमकते हुए हजारों वाट के बल्ब होते हैं, जिनकी तरफ देश के कोने-कोने से अपनी जिंदगियों से हताश लाखों-करोड़ों लोग खींचे चले आते हैं। इन लोगों की आंखों में अपनी उम्र से लंबे सपने होते हैं।’ ये उपन्यासकार प्रज्ञा के सद्य प्रकाशित उपन्यास ‘कांधों पर घर’ की भूमिका की पहली पंक्ति है। यही से हमें ज्ञात ....

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