मैं-तेरे भी, ओ ‘काल’ ऊपर!
सौंदर्य यही तो है, जो तू नहीं है, ओ काल!
जो मैं हूं-
मैं कि जिसमें सब कुछ है---
क्रांतियां, कम्यून,
कम्युनिस्ट समाज के
नाना कला विज्ञान और दर्शन के
जीवंत वैभव से समन्वित
व्यक्ति मैं।
मैं, जो वह हरेक हूं
जो, तुझसे, ओ काल, परे है
-शमशेर बहादुर सिंह
कभी ....
