दुष्यंत कुमार का शेर है-‘इस शहर में वो कोई बारात हो या वारदात / अब किसी भी बात पर खुलती नहीं
हैं खिड़कियां।’
इन दिनों यह शे’र कुछ ज्यादा ही याद आ रहा है। ऐसा लग रहा है जैसे हम एक सिकुड़े हुए लोकतंत्र के बाशिंदे होते जा रहे हैं। हमारी लोकतांत्रिक आजादी इन दिनों सहमी हुई है। खुलकर बोलने का जो अधिकार संविधान ने हमें दिया है, हम उसका इस्तेमाल करने से डरने लगे हैं।
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