इक्कीसवीं सदी की हिंदी कहानियां नब्बे के दशक में हुए परिवर्तन से कई मायने में जुदा ठहरती हैं। विमर्शमूलक कहानियों के मध्य दो-एक कहानीकारों को अलग कर दें, तो ज्यादातर कच्चेपन के शिकार ही हुए। पूरे एक दशक का दौर कच्चे-पक्के की आवाजाही के बीच गुजर गया। इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में विमर्शमूलक कहानियां ज्यादा परिपक्व होकर सामने आईं।
दूसरी तरफ एकदम नई पीढ़ी ने कहानी ....
