प्रांजल राय

कोरोना काल में 

विज्ञान के अँधेरे में सोने वाली दुनिया
भ्रम के उजाले में भटकती है ।
जीवन के खंडहरों में
सिर्फ उजाला नहीं, न ही सिर्फ अँधेरा है
एक शाश्वत गोधूलि वेला है,
अँधेरे की कोख में जहाँ टपकती हैं रोशनी की बूँदें-
जलकर बुझ जाते, झरते जुगनुओं की तरह ।
फिर भी अपनी शक्ति के अहंकार को
रूई की तरह कानों में ठूँसकर
झुठलाते हो हर आवाज़ को,
कहो, पिघले हुए समय से डर तो लगत....

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