‘पाखी’ का ‘देश विशेषांक’ कुछ कहानियों को छोड़कर पूरा पढ़ लिया। 220 पेज के इस ‘लघु विशाल’ विशेषांक ने कंटेंट के स्तर पर निराश किया। विचार खंड के तहत जिन लेखो को लिए गया है उन्हें पहले पढ़ चुका था और लेख खंड के तहत जो लेख हैं उनमें सैद्धांतिक जिरह नदारद है। ‘देश’ कोई अमूर्त आइडेंटिटी या नक्शा भर तो नहीं है? न ही उत्तेजना का गुबार है! आखिर देश माने क्या?
इस अंक....
