सूर्यबाला

प्रेम जनमजेय के नाम सूर्यबाला का एक खत

प्रिय प्रेम,
अभी कल ही मैंने ‘जन आकांक्षा का रांग नंबर’ (शीर्षक व्यंग्य) कुरियर करते वक्त मन ही मन दसियों बार गंगाजली उठाई कि अपने इस नश्वर जीवन की अंतिम व्यंग्य-रचना में डिस्पैच कर चुकी हूं और अब बाकी बचे शेष जीवन में अधजल में छूटी कहानियां और उपन्यास---।
कि तब तक मेरे व्यंग्य के मनोविज्ञान की तलाशी लेने तुम्हारा पत्र आ पहुंचा। कल की गंगाजली वाली कसम के हवाले से कह....

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