हम लोगों मां को लेखिका मानते ही नहीं थे। यह पता था कि वह हर दिन थोड़ी देर इधर-उधर बैठकर लिखती हैं। उन्होंने कभी हमें यह अहसास होने नहीं दिया था कि हम लोगों से जरूरी उनका कोई दूसरा भी काम (लेखन) है। घर का समूचा काम करने के बाद ही वह कुछ लिखने बैठती थीं।
मां कहीं भी बैठकर लिख लेती थीं। उन्हें लिखने के लिए कोई खास जगह या टेबल-कुर्सी, एकांत नहीं चाहिए होता था। हम सभी भाई-बहनों न....
