मनीष वैद्य

‘चांद’ पाने का संघर्ष है ‘चांद गवाह’

समाज और सामाजिक के लिहाज से देखें तो हम बीते तीस-चालीस सालों में इतना ज्यादा और इतनी तेजी से बदले हैं, जितना शायद इससे पहले कभी सो-दो सौ सालों में भी नहीं बदले होंगे। सामाजिकता छीजती जा रही है और हम नितांत आत्म केंद्रित होते जा रहे हैं। संवेदना खोकर हम मशीन में तब्दील हो रहे हैं। अब हमें किसी के दर्द से दुख नहीं सुख मिलता है। एक अजीब किस्म की आपाधापी और अंधी दौड़ म....

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