‘यह रात जैसे दर्पणों की गली हो और तुम एक अकेली चांदनी बनकर निकली हो---’
छत की रेलिंग पर भिंचे अपने हाथ की उंगलियों को देखता हूं। दाएं हाथ की अनामिका उंगली। रिंग फिंगर, जो खाली है। और एक अंगूठी भी बिना पहनी बक्से में रखी है। मैंने तो उम्मीद में बात फाइनल होने से पहले खरीद भी लिया था। अंगूठी की रस्म के दिन उसे पहनाने की सोचकर।
अनामिक....
