रिया बोरा

काश 

सितंबर का महीना था। आसमान में काले बदल उमड़ रहे थे। शायद बारिश होने वाली थी! ---बारिश से पहले होने वाली नमी मैं महसूस कर सकती थी। खिड़की खुली होने कि वजह से मिट्टी कि वह सौंधी खुशबू कमरे में फैल गयी थी। बगीचों में लगे, पेड़ाें के पत्तों का सरसराना ऐसा लग रहा था, जैसे आपस में कुछ चुगली कर रहे हो। मैं अपने कमरे में बैठी पढ़ रही थी। नहीं---नहीं! सच कहूं तो बस कोशिश कर रही थी। क....

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