अर्पण कुमार

परिवर्तनशील समय में स्पंदित जीवन

हम अपने पूर्ववर्ती सर्जकों के स्वरों, उनके तेवरों को अपने हिसाब से अपनाते हैं। उनपर बातचीत करते हैं। हमारे ये पूर्ववर्ती सर्जक भी ऐसा करते रहे हैं। साहित्य और कला की परंपरा इसी तरह से समृद्ध होती है। उसकी रफ्रतार धीमी होती है और उसमें कोई शार्टकट स्थाई महत्व का नहीं होता।
टी-एस- इलियट तो इस विषय पर अपना आलेख ‘ट्रेडिशन एंड दि इंडिविजुअल टैलेंट’ (1919) ही लिख....

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