कमलानंद झा की सद्यः प्रकाशित पुस्तक ‘नागार्जुन: दबी-दूब का रूपक’ पर गहन विचार करने से पूर्व हिंदी के प्रसिद्ध रचनाकार शमशेर बहादुर सिंह की ये पंक्तियां-‘बात बोलेगी/हम नहीं भेद खोलेगी/बात ही का जिक्र करना बिल्कुल ही समीचीन प्रतीत होता है।
पुस्तक के अध्यायों के शीर्षक खुद ही अपने बारे में बहुत कुछ कह जाते हैं।
उदाहरणार्थ-‘सुदीर्घ दासता की मुक्ति क....
