नरेंद्र पुंडरीक

नरेंद्र पुंडरीक की तीन कविताएं

हमें डर लगता है 

जिन लोगों के घर 
नदी किनारे होते हैं 
उन गांवों और घरों की कथा 
बसने से कही अधिक 
उजड़नें की अधिक होती है 

बहते हुए छप्पर, थालियां 
पतीले चारपाइयां 
खाली पीपे, लेरु-बछेरु
हफ्रते-दस दिन हांव हांव करते 
उठती दीवारों तानते छप्परों की 
अकथ कथा होती है 
हमारे उजड़ने और बसने की ....

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