राजकुमार कुंभज

राजकुमार कुंभज की चार कविताएं

मैं चलता हूं, मैं गिरता हूं 

मैं चलता हूं, मैं गिरता हूं 
मैं गिरता हूं, मैं उठता हूं, मैं संभलता हूं 
मैं गिर-गिरकर संभलता हूं और चलता हूं 
संभल-संभलकर चलना मेरी आदत नहीं है 
और मेरी फितरत भी नहीं है 
लेकिन जब मैं गिरता हूं तो संभलता हूं 

इस तरह चलना, गिरना, उठना 
और संभलना, चलता रहता है 
मैं संभलता रहता ....

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