ऐसे में एक गुलाबी शाम उसकी भेंट हुई मोहम्मद आसिफ से। दोनों मिलते रहे। जवानी के प्रेम जैसा उत्ताल आवेग और गुलाबी उन्माद जैसा कुछ नहीं घटा था जीवन में, लेकिन इतना जरूर हुआ था कि आसिफ के मिलते ही सन्नाटे से भरी उसकी जिंदगी में ढोर मंजीरे बज उठे थे। व्यावहारिक फातिमा ने सोचा कि जीवन में प्रेम होता है, प्रेम में जीवन नहीं। कर्म की उड़ान तो भर ही रही है वह, क्या हर्ज यदि प्रेम की प....
