शैलबाला महापात्र

शैलबाला महापात्र की तीन कविताएं

दीवार  


कितने मन धूप को
उसने दिखा दी है
अपनी रूखी पीठ

कितनी झमाझम बारिश को
ऊफ किए बिना संभाली है
उसकी हड़ियाई छाती

ओस की कितनी बूंदों से
नरम हो गए हैं
उसके झुके हुए कंधे

कोई सटीक हिसाब नहीं इन सबका
अब तो खुद को तब्दील करना पड़ेगा
एक दीवार में
पर दीवार बनना भी
इतना आसान ....

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