हरजेन्द्र चौधरी

 चाबी

वह  बड़ा मनहूस-सा दिन था। सुबह उठकर आदतन बाल्कनी में निकलकर नीचे झांका तो पाया कि मेरी कार गायब है। दिल-दिमाग झटका खा गए। उसे मैंने कुछ ही महीने पहले खरीदा था। अब तक मैंने कार-लोन की कुल पांच-छह किश्तें जमा कराई थीं। घर के बाहर पार्क की गई कार को वहां न पाकर कुछ देर के लिए तो लगा कि मैं कोई बुरा सपना देख रहा हूं। पिछले साल पास-पड़ोस में जब दो-तीन कारों की चोरी हुई तो मुझे अपनी ....

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