चेतना झा

बसंत के चार दिन

उस साल कार्तिक तक बरसात सावन-भादो-सा तेवर लिये था। कृष्णपक्ष की अंधरिया। तीन पहर बीतने पर लक्ष्मी ने सांस रोककर आस-पास की टोह ली। पास में पुआल पर सोए नकुल को पीठ पर बांधा और निकल पड़ी। हाथ को हाथ को नहीं सूझ रहा था, पर बोराडीह के जंगल में घूमने के लिए लक्ष्मी को अब आंख की जरूरत भी शायद नहीं। पेड़, झाड़ी, नाला, गड्डा, ढलान, ऊंचाई सब उसके कदमों से सधे हैं। रात-बिरात, देर-सबेर, अकेले-द....

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