सुबह मुंह अंधेरे उठकर वृंदा ठंडे जल से स्नान करती है, फिर पूजा -पाठ करती है। तुलसी में जल चढ़ाती है और उसके बाद कहीं जाकर अन्न का दाना अपने सूखे पड़ आए हलक से नीचे उतारती है। दुनिया टस-से-मस हो जाए, किंतु उसकी इस दिनचर्या में तनिक भी फेरबदल उसे स्वीकार्य नहीं होता। चेले सब कह-कहकर हार गए कि अब उम्र हो चली है, तनिक अपना भी ध्यान रखना चाहिए। वृंदा को इन बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता, ....
